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विचार-आलेख

दलित आदिवासी आंदोलन को “रोजगार” जैसे अतिगंभीर मुद्दे को प्राथमिकता देनी चाहिए-धर्मेंद्र जाटव

दलित आदिवासी जैसे कमजोर वर्गों के सामने सामाजिक आर्थिक फ्रंट पर अनगिनत चुनौतियां है। एक तरफ जातिव्यवस्था के चलते चला आ रहा सामाजिक आर्थिक शोषण व अत्यचार है तो, दूसरी तरफ धनतंत्र में परिणत हो चुके हमारे लोकतंत्र में अपने हक हिस्से अधिकारों को प्राप्त करने की चुनौतियां। इन अनगिनत चुनौतियों के चलते अलग अलग मुद्दों को लेकर चल रहे दलित आदिवासी आंदोलन में कोई स्पष्ट फ्रंट नज़र नही आता। अधिकतर लोग अन्याय अत्याचार जैसी आकस्मिक आपराधिक घटनाओं को लेकर ही आंदोलित दिखाई देते है। जो कि हर घटना के साथ पैदा होता है और समाप्त हो जाता है, अन्याय अत्याचार इन कमजोर समाज की भावनाओ से जुड़ा मुद्दा भी है। इसलिए सामाजिक आवेश ऊर्जा का कार्य करता है, यह सही है कि प्रशासनिक लापरवाही के अनगिनत उदाहरण हमारे सामने भरे पड़े है, और इस फ्रंट पर अब भी बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है। क्योंकि इन वर्गों पर घटी आपराधिक घटनाओं के बाद राजनीतिक दबाब में व खुद पुलिस प्रशासन की जातिवादी मानसिकता के चलते बड़े पैमाने पर न्याय की हत्या हुई है।

विगत दो तीन साल में युवा आंदोलनकारियों की जो नई लहर तैयार हुई है, अन्याय अत्याचार के इन्ही मामलों के चलते हुई है। हालांकि आज़ादी के बाद से यही लहर सबसे प्रभावी रही है। और अनगिनत नेता इन्ही मामलों में संघर्ष से निकले।
पिछले दौर में देखा जाए तो एक संदर्भ में इन वर्गों की आर्थिक चुनौतियां थोड़े कम थी। क्योंकि तब तक इस वर्ग के पास कुटीर उद्योग व थोड़ी बहुत ही सही कृषि भूमि भी थी। साथ ही तब तक पढ़ लिख पाए मुट्ठी भर लोगों के पास कुछ नौकरियो के अवसर भी सुलभ थे।
आज स्थिति बहुत ही अलग है। विगत दशकों में इन वर्गों में पढ़े लिखे लोगों की एक बड़ी भीड़ तैयार हो गई है। LPG की नीति अपनाने के बाद, सरकारी संरक्षण व बैंकिंग सुविधा नही मिलने के चलते कुटीर उद्योग तो तबाह हुए ही, रोजगार प्रदायक के रूप में सरकारी क्षेत्र भी भयंकर रूप से सिकुड़ गया है। रही बात कृषि भूमि की तो हर पीढ़ी के साथ हुए भूमि विखंडन के चलते अब कृषि भूमि परिवार का पेट भरने लायक भी नही रह गई है।
इस तरह देखा जाए तो संघर्ष के एक फ्रंट के रूप में अन्याय अत्याचारों के अलावा आर्थिक फ्रंट ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। यही नही अन्याय अत्याचारो के पीछे जो सबसे बड़ा कारण रहा है वो जाति व्यवस्था के साथ साथ इन वर्गों का आर्थिक रूप से कमजोर होना ही रहा है। ऐसे में ये वर्ग अब अन्याय अत्याचारों के लिए अब और भी ज्यादा सुभेद्य हो गया है।
लेकिन यह बहुत चिंताजनक है कि इस वर्ग के आंदोलनों में आर्थिक मुद्दे लगभग गायब ही रहते है। या कहे कि इन मुद्दों पर आंदोलन संगठित करने के प्रयास ही कही दिखाई नही देते। बहुजन आंदोलन भी आज अलग अलग जातियों के नेताओं का पैनोरमा तैयार कर गठजोड़ बनाकर महज पावर पॉलिटिक्स करने का खेल ही ज्यादा नज़र आने लगा है। ऐसे में इन वर्गों के युवा साथियों को “रोजगार” जैसे मुद्दों पर लामबन्दगी को करने का प्रयास करना चाहिए, आने वाले समय मे आर्थिक मुद्दे और भी ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि कोरोना काल मे हुई भयंकर आर्थिक तबाही का असर भी बहुत भयानक होने वाला है। ऐसे में यदि रोजगार जैसे मुद्दों के इर्द गिर्द व्यापक लामबन्दगी बहुत जरूरी है, और शायद तब ही विभिन्न पोलिटिकल पार्टियां इस मुद्दे को गंभीरता से लेंगी।

-धर्मेंद्र कुमार जाटव

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